GIPE अध्ययन: महाराष्ट्र के किसान जंगली जानवरों के चलते ₹40,000 करोड़ तक का नुकसान झेलते हैं; राहत सिर्फ लगभग 1%

गोक्हले इंस्टिट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स (GIPE) के अध्ययन के अनुसार, जंगली जानवरों जैसे सूअर, बन्दर, नीलगाय आदि से महाराष्ट्र के किसानों को सालाना ₹10,000–₹40,000 करोड़ का नुकसान होता है, जबकि उन्हें राहत के रूप में मुआवज़ा 1-2% से भी कम मिलता है। सुधार की जरूरत है।

अक्टूबर 4, 2025 - 10:01
 1
GIPE अध्ययन: महाराष्ट्र के किसान जंगली जानवरों के चलते ₹40,000 करोड़ तक का नुकसान झेलते हैं; राहत सिर्फ लगभग 1%
एक किसान जंगली सूअरों या बंदरों द्वारा क्षतिग्रस्त फसल के निशान वाले आंशिक रूप से खाए गए खेत में खड़ा है; दूर जंगल की सीमा दिखाई दे रही है; क्षतिग्रस्त फसलें अस्त-व्यस्त हैं।

पुणे स्थित गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स (GIPE) के सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में महाराष्ट्र में जंगली शाकाहारी जानवरों द्वारा पहुँचाए गए फसल क्षति का खतरनाक स्तर सामने आया है। अनुमान है कि यह वार्षिक नुकसान ₹10,000 करोड़ से ₹40,000 करोड़ के बीच है, जिसमें कोंकण क्षेत्र को सबसे अधिक नुकसान झेलना पड़ता है। जंगली सूअर, बंदर, नीलगाय, गौर (जंगली भैंसा), काला हिरण और हाथी जैसे वन्यजीव नियमित रूप से खेतों पर धावा बोलते हैं, जिससे न केवल फसलें नष्ट होती हैं बल्कि किसानों को अपनी फसल के पैटर्न में बदलाव करने के लिए भी मजबूर होना पड़ता है।

इस अध्ययन ने महाराष्ट्र के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लगभग 1,200 किसानों का सर्वेक्षण किया और पाया कि 54% किसानों ने लगातार वन्यजीवों के हस्तक्षेप के कारण कुछ फसलों की खेती पूरी तरह बंद कर दी है। 64% अन्य किसानों ने खेतों की रखवाली में लगने वाली उच्च लागत और श्रम का हवाला देते हुए अपनी खेती का क्षेत्र कम कर दिया है। इस तरह के बदलाव न केवल भौतिक नुकसान को दर्शाते हैं बल्कि कृषि क्षमता और खाद्य उत्पादन में दीर्घकालिक गिरावट को भी इंगित करते हैं।

औसतन, यह नुकसान प्रति हेक्टेयर सालाना ₹27,000 है। हालाँकि, किसानों को मिलने वाली राहत/मुआवजा चौंकाने वाला कम है—जो दर्ज किए गए नुकसान का 1-2% से भी कम है। जटिल नौकरशाही प्रक्रिया, किसानों में मुआवजा कानूनों के बारे में जागरूकता की कमी, दावों की प्रक्रिया में देरी और वन/कृषि विभाग के क्षेत्र कर्मचारियों की कमी इस स्थिति को और गंभीर बनाती है। कई किसान तो दावा भी दायर नहीं करते क्योंकि प्रक्रिया ही समय लेने वाली और जटिल होती है।

इसके प्रभाव दिखाई देने वाली फसल क्षति से भी आगे तक फैले हुए हैं। इसमें अप्रत्यक्ष लागतें शामिल हैं: रखवाली के लिए अतिरिक्त श्रम, बाड़ लगाना, खेत खाली छोड़ देने या कम खेती करने पर होने वाली अवसर लागत, और मनोवैज्ञानिक तनाव। कोंकण, विदर्भ और सह्याद्री जैसे जंगल के करीब के क्षेत्रों में, अध्ययन में स्थानीय पैटर्न नोट किए गए: कोंकण में बंदरों से फसल का नुकसान अधिक होता है, विदर्भ में नीलगाय अधिक समस्याग्रस्त है, और जंगली सूअर एक सार्वभौमिक रूप से व्यापक समस्या है।

GIPE अध्ययन के लेखकों ने तत्काल सुधार सुझाए हैं: एक किसान-हितैषी, पारदर्शी और समय पर मुआवजा तंत्र; संरक्षण-संगत प्रथाओं (जैसे सुरक्षात्मक बाड़ लगाना, वन्यजीव-रोधी अवरोध) के लिए प्रोत्साहन; जागरूकता अभियान; और मजबूत कानून लागू करना। इन बदलावों के बिना, छोटे और सीमांत किसान फसलों को छोड़ सकते हैं, जिससे खाद्य असुरक्षा, आय का नुकसान और ग्रामीण प्रवासन में वृद्धि हो सकती है।