HTBT फसलों पर अनिश्चित नीति से संकट में खेती; शेतकरी संगठन ने नितिन गडकरी से की नीति स्पष्ट करने की मांग
देश में HTBT (खरपतवार-सहनशील) कपास, मक्का और सोयाबीन के प्रति केंद्र सरकार की अनिश्चित नीति के कारण कृषि क्षेत्र के सामने बड़ा संकट पैदा हो गया है। इस पृष्ठभूमि में, शेतकरी संगठन ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से मुलाकात कर इस तकनीक को आधिकारिक मंजूरी देने की मांग की है।
शेतकरी संगठन ने आरोप लगाया है कि HTBT कपास, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों पर केंद्र सरकार की स्पष्ट नीति न होने के कारण खेती को भारी नुकसान हो रहा है। आज, 11 अप्रैल 2026 को नागपुर में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को इस संबंध में एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा गया। इस ज्ञापन में खरपतवार-सहनशील और कीट-प्रतिरोधी किस्मों को तत्काल आधिकारिक मंजूरी देने का अनुरोध किया गया है।
भारत में वर्तमान में केवल 'बीजी-2' (BG-II) कपास को आधिकारिक अनुमति प्राप्त है। हालांकि, खरपतवार नियंत्रण की समस्या के कारण किसान पिछले 15 वर्षों से अवैध रूप से HTBT कपास उगा रहे हैं। केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान (CICR) के अनुसार, भारत की कपास उत्पादकता केवल 450 किलो प्रति हेक्टेयर है, जबकि वैश्विक औसत 750 किलो प्रति हेक्टेयर है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2006 के बाद कपास बीज तकनीक में नया शोध न होने के कारण यह उत्पादकता ठहर गई है।
जबलपुर स्थित खरपतवार अनुसंधान निदेशालय की रिपोर्ट के अनुसार, खरपतवार के कारण सोयाबीन (10-100%), कपास (40-60%) और चावल जैसी फसलों की पैदावार में भारी गिरावट आती है। वर्तमान में खेती में मजदूरों की भारी कमी है और पारंपरिक तरीके से निराई-गुड़ाई करना महंगा साबित हो रहा है। खरीफ सीजन में लगातार होने वाली बारिश के कारण मजदूरों की मदद से खरपतवार नियंत्रण करना असंभव हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप किसानों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है और लाभ घट जाता है।
शेतकरी संगठन के कृषि तकनीक मोर्चे के प्रमुख मिलिंद दामले ने कहा कि HTBT तकनीक खरपतवार नाशक के छिड़काव के माध्यम से खरपतवार नियंत्रण को आसान और सस्ता बनाती है। यदि सरकार इस तकनीक को आधिकारिक मान्यता देती है, तो मजदूरों पर होने वाला खर्च कम होगा और उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलेगी।