वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर युद्ध का साया: खाद की कीमतों में उछाल; रूस और चीन ने खाद्य सुरक्षा को दी प्राथमिकता
8 अप्रैल 2026 को खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष ने ईंधन और उर्वरक की कीमतों को बढ़ा दिया है, जिससे 2026 में गेहूं के उत्पादन पर सीधा असर पड़ने की संभावना है। इस बीच, रूस ने अपना निर्यात शुल्क बढ़ा दिया है, जबकि चीन ने हाई-टेक तकनीक के दम पर रिकॉर्ड अनाज उत्पादन का लक्ष्य रखा है।
आज, 8 अप्रैल 2026 को वैश्विक कृषि बाजार में भारी अस्थिरता देखी जा रही है। FAO के नवीनतम 'अनाज आपूर्ति और मांग ब्रीफ' के अनुसार, 2026 में वैश्विक गेहूं उत्पादन 820 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.7% कम है। इस गिरावट का मुख्य कारण मध्य-पूर्व में बढ़ता संघर्ष है, जिससे उर्वरकों और ऊर्जा की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। इसका सबसे बुरा असर दक्षिणी गोलार्ध के देशों पर पड़ने की आशंका है।
रूस और यूक्रेन: रूस ने आज गेहूं पर अपना निर्यात शुल्क (Export Duty) बढ़ाकर 515.6 RUB प्रति टन कर दिया है। यह कदम घरेलू मुद्रास्फीति को रोकने और खाद्य भंडार को सुरक्षित रखने के लिए उठाया गया है। इससे वैश्विक बाजार में गेहूं की आपूर्ति कम हो जाएगी, जिससे अमेरिका और कनाडा में गेहूं के वायदा (Futures) भाव बढ़ गए हैं। यूक्रेन में युद्ध के कारण वहां बुवाई के क्षेत्र में भी भारी कमी दर्ज की गई है।
चीन का खाद्य सुरक्षा अभियान: चीन ने आज अपने 2026 के कृषि रोडमैप की घोषणा की है, जिसमें 725 मिलियन टन अनाज उत्पादन का रिकॉर्ड लक्ष्य रखा गया है। चीन अब "न्यू प्रोडक्टिव फोर्सेज" के तहत एआई (AI) और सैटेलाइट तकनीक का उपयोग करके उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दे रहा है, ताकि आयात पर निर्भरता कम की जा सके।
अमेरिका और कनाडा: USDA की जानकारी के अनुसार, खाद की बढ़ती कीमतों के कारण अमेरिकी किसान गेहूं के बजाय सोयाबीन की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे अमेरिका में गेहूं का रकबा ऐतिहासिक निचले स्तर पर जाने का डर है। कनाडा में भी ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण खेती की लागत 15% से 20% तक बढ़ गई है।
इजरायल और मध्य-पूर्व: इजरायल में जारी संघर्ष के कारण वहां के बागवानी (Horticulture) क्षेत्र को बड़ा झटका लगा है, जिससे यूरोप को होने वाला फल-सब्जी निर्यात बाधित हुआ है। लाल सागर (Red Sea) में जहाजों पर हुए हमलों के कारण अंतरराष्ट्रीय शिपिंग दरें बढ़ गई हैं, जिसका सीधा असर दुनिया भर के उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ रहा है।