खानदेश में फलों के दाम धड़ाम: पश्चिम एशिया युद्ध के बीच केला और तरबूज की कीमतों में ऐतिहासिक गिरावट

मार्च 2026 में केला और तरबूज की थोक कीमतों में 70% से अधिक की गिरावट आने से खानदेश क्षेत्र के किसान गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं। जहां केले के दाम ₹2,200 से गिरकर ₹400-₹700 प्रति क्विंटल रह गए हैं, वहीं तरबूज के भाव ₹4-₹7 प्रति किलो तक आ गए हैं।

मार्च 28, 2026 - 09:10
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खानदेश में फलों के दाम धड़ाम: पश्चिम एशिया युद्ध के बीच केला और तरबूज की कीमतों में ऐतिहासिक गिरावट
जलगांव के भीषण गर्मी वाले खेत में कटे हुए तरबूज और केले के ढेर के पास खड़ा एक चिंतित किसान, जिसके बैकग्राउंड में फरवरी से मार्च तक कीमतों के गिरने का ग्राफ दिखाया गया है।

खानदेश की कृषि अर्थव्यवस्था वर्तमान में भीषण गर्मी और वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता की दोहरी मार झेल रही है। 28 मार्च, 2026 तक, इस क्षेत्र की प्रमुख फसलों—केला और तरबूज—की थोक कीमतों में भारी गिरावट देखी जा रही है। सीधी खेत-खरीद (Farm-gate purchase) में केले को ₹400 से ₹700 प्रति क्विंटल के न्यूनतम भाव पर खरीदा जा रहा है, जो फरवरी में महाशिवरात्रि के दौरान ₹2,200 के स्तर पर था। इसी तरह, तरबूज की दरें जो फरवरी के मध्य में ₹20-₹22 प्रति किलो थीं, अब गिरकर केवल ₹4 से ₹7 प्रति किलो रह गई हैं।

इस बाजार मंदी का मुख्य कारण पश्चिम एशिया (Middle East) में चल रहा संघर्ष है जो फरवरी के अंत में तेज हुआ था। हालांकि खानदेश के गर्मियों के कुल केले का केवल 2-3% हिस्सा सीधे पश्चिम एशिया को निर्यात किया जाता है, लेकिन इस निर्यात के रुकने से पूरी आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो गई है। रिपोर्टों के अनुसार, बड़े खरीदार और व्यापारियों की लॉबी युद्ध को एक बहाने के रूप में इस्तेमाल कर स्थानीय खरीद दरों को दबा रही है, जिससे किसानों की कीमत पर उनका मुनाफा बढ़ रहा है।

तरबूज उत्पादक विशेष रूप से प्रभावित हुए हैं, जिन्हें प्रति एकड़ लगभग ₹40,000 से ₹45,000 का नुकसान उठाना पड़ रहा है। आवक कम होने के बावजूद होली के त्योहार से पहले ही कीमतों में गिरावट शुरू हो गई थी। जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, इन फलों की शेल्फ लाइफ कम हो रही है, जिससे किसान अपनी उपज को खराब होने से बचाने के लिए 'औने-पौने' दामों पर बेचने को मजबूर हैं। उर्वरक और सिंचाई सहित बढ़ती उत्पादन लागत और गिरते बाजार मुनाफे के बीच का अंतर किसानों के लिए खेती का खर्च निकालना भी असंभव बना रहा है।

केला क्षेत्र में, उत्तर भारतीय बाजार भी मंदी के संकेत दे रहे हैं। जलगांव और नंदुरबार जैसे जिलों में कोल्ड स्टोरेज बुनियादी ढांचे की कमी के कारण किसानों के पास व्यापारियों द्वारा दी जाने वाली कम दरों को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। स्थानीय किसान संगठनों ने तीव्र असंतोष व्यक्त किया है और आरोप लगाया है कि शहरी केंद्रों में मांग स्थिर होने के बावजूद "व्यापारी-खरीदार लॉबी" कृत्रिम रूप से कीमतों को दबा रही है।

जैसे-जैसे गर्मी का मौसम चरम पर पहुंच रहा है, खानदेश का किसान समुदाय तत्काल सरकारी हस्तक्षेप की मांग कर रहा है। निर्यात के लिए एक स्थिर गलियारे या नष्ट होने वाले फलों के लिए न्यूनतम मूल्य सहायता तंत्र के बिना, मौजूदा बाजार अस्थिरता हजारों बागवानी किसानों को कर्ज के जाल में धकेलने का खतरा पैदा कर रही है।