संशोधित जीआर से किसानों का मुआवजा 40% घटेगा, कार्यकर्ताओं का आरोप
महाराष्ट्र के किसान कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि हाल ही में जारी संशोधित सरकारी प्रस्ताव (जीआर) से किसानों को मिलने वाला मुआवजा करीब 40% तक घट जाएगा। उनका कहना है कि यह कदम फसल नुकसानी से जूझ रहे किसानों की मुश्किलें और बढ़ा देगा।
महाराष्ट्र सरकार द्वारा हाल ही में जारी किए गए मुआवजा संबंधी संशोधित सरकारी प्रस्ताव (जीआर) ने किसानों और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है। किसान संगठनों का कहना है कि नए नियमों से किसानों को मिलने वाला मुआवजा लगभग 40% तक कम हो जाएगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य के किसान भारी बारिश, बाढ़ और अस्थिर बाजार कीमतों जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह कदम किसानों की मदद करने के बजाय उनकी परेशानियों को और बढ़ा देगा।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि फसल नुकसानी के आकलन और मुआवजे की गणना का तरीका बदल दिया गया है। पहले की प्रणाली में किसानों को कुछ हद तक राहत मिल जाती थी और वे दोबारा खड़े हो पाते थे। लेकिन नए प्रावधानों के तहत उन्हें काफी कम राशि मिलेगी, जिससे छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। इन किसानों के पास जीविका का कोई दूसरा साधन नहीं है और वे पूरी तरह मौसमी फसलों पर निर्भर रहते हैं।
किसान संगठनों ने इस फैसले के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी है। महाराष्ट्र के सूखा और बाढ़ प्रभावित जिलों के किसान एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार का यह फैसला किसानों की वास्तविक समस्याओं की अनदेखी करता है और उनके कल्याण के वादों के विपरीत है। किसान नेता जीआर को तुरंत वापस लेने और पुराने नियमों को बहाल करने की मांग कर रहे हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसके गंभीर असर की आशंका भी जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि मुआवजा कम होने से किसानों की गरीबी और कर्ज का बोझ और बढ़ेगा। फसल नुकसानी की स्थिति में कई किसान गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर सकते हैं, जिससे ग्रामीण समाज की संरचना कमजोर होगी और शहरी संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा।
वहीं दूसरी ओर सरकार का कहना है कि यह संशोधित जीआर मुआवजा प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने के लिए लाया गया है। अधिकारियों का दावा है कि इससे वितरण की गति और अनुशासन बेहतर होगा। लेकिन कार्यकर्ता इस तर्क से सहमत नहीं हैं और उनका कहना है कि जब तक इस फैसले को वापस नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। आने वाले हफ्तों में इस मुद्दे पर और तीखी बहस और विरोध देखने को मिल सकता है।